गुर्जर प्रतिहार वंश

मालवा का शासक नागभट्ट प्रथम गुर्जर प्रतिहार वंश का संस्थापक था।

नागभट्ट द्वितीय को राष्ट्रकूट सम्राट गोविंद तृतीय ने हराया था।

प्रतिहार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली एवं प्रतापी राजा मिहिर भोज था।

मिहिर भोज ने अपनी राजधानी कन्नौज को बनाया।

वह विष्णु भक्त था, उसने विष्णु के सम्मान में आदि वराह की उपाधि धारण की।

राजशेखर प्रतिहार शासक महेंद्रपाल के दरबार में रहते थे।

इस वंश का अंतिम राजा यशपाल था।

दिल्ली नगर की स्थापना तोमर नरेश आनंदपाल ने 11वीं सदी के मध्य में की।

गहढ़वाल राजवंश

गढ़वाल या राठौड़ वंश का संस्थापक चंद्रदेव था इसकी राजधानी वाराणसी थी।

इस वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली राजा गोविंदचंद्र था।

इसका मंत्री लक्ष्मीधर शास्त्रों का प्रकांड पंडित था।

गोविंद चंद्र की एक रानी कुमार देवी ने सारनाथ में धर्मचक्र जिन विहार बनवाई।

पृथ्वीराज तृतीय ने स्वयंवर से जयचंद की पुत्री संयोगिता का अपहरण कर लिया।

इस वंश का अंतिम शासक जयचंद था जिसे गौरी ने 1194 ईस्वी में चंदावर के युद्ध में हराया था।

चौहान वंश

चौहान वंश का संस्थापक वासुदेव था ।

इस वंश की प्रारंभिक राजधानी अहीच्छत्र थी परंतु बाद में अजय राज द्वितीय ने अजमेर नगर की स्थापना की और अजमेर को राजधानी बनाया।

इस वंश का सबसे शक्तिशाली शासक अर्णोराज का पुत्र विग्रहराज चतुर्थ हुआ।

सोमदेव विग्रहराज चतुर्थ के राजकवि थे। इन्होंने ललित विग्रहराज नामक नाटक लिखा।

अड़ाई दिन का झोपड़ा नामक मस्जिद शुरू में विग्रहराज चतुर्थ द्वारा निर्मित एक विद्यालय था।

पृथ्वीराज तृतीय इस वंश का अंतिम शासक था।

चंद्रवरदाई पृथ्वीराज तृतीय का राज कवि था जिसकी रचना पृथ्वीराजरासो है।

रणथंबोर के जैन मंदिरों का शिखर पृथ्वीराज तृतीय ने बनवाया था।

तराइन का द्वितीय युद्ध 1192 ईस्वी में हुआ इसमें गौरी ने पृथ्वीराज तृतीय को हराया।

परमार वंश

परमार वंश का संस्थापक उपेंद्र राज था इसकी राजधानी धारा नगरी थी।

परमार वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक राजा भोज था।

राजा भोज ने भोपाल के दक्षिण में भोजपुर नामक झील का निर्माण करवाया।

राजा भोज कविराज की उपाधि से विभूषित शासक था।

भोज ने अपनी राजधानी में सरस्वती मंदिर का निर्माण करवाया था।

इस मंदिर के परिसर में संस्कृत विद्यालय भी खोला गया था।

राजा भोज के शासनकाल में धारा नगरी विधा और विद्वानों का प्रमुख केंद्र थी।

परमार वंश के बाद तोमर वंश का उसके बाद चाहामान वंशि का और अंततः 1297 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नसरत खान और उलूग खां नने मालवा पर अधिकार कर लिया।

चंदेल वंश

प्रतिहार साम्राज्य के पतन के बाद बुंदेलखंड की भूमि पर चंदेल वंश का स्वतंत्र राजनीतिक इतिहास प्रारंभ हुआ।

चंदेल वंश की स्थापना नन्नुक ने 831 ई. को की।

इसकी राजधानी खजुराहो थी प्रारंभिक की राजधानी कालिंजर थी।

चंदेल वंश का प्रथम स्वतंत्र एवं सबसे प्रतापी राजा यशोवर्मन था।

यशोवर्मन ने कन्नौज पर आक्रमण कर प्रतिहार राजा देवपाल को हराया तथा उससे एक विष्णु की प्रतिमा प्राप्त की जिसे उसने खजुराहो के विष्णु मंदिर में स्थापित किया।

ढंग ने जिन्ननाथ, विश्वनाथ तथा वेदनाथ मंदिर का निर्माण करवाया।

कंदरिया महादेव मंदिर का निर्माण धंगदेव द्वारा 999 ई. में किया गया।

चंदेल शासक विद्याधर ने कन्नौज के प्रतिहार शासक राज्यपाल की हत्या कर दी।

चंदेल वंश का अंतिम शासक परमर्दीदेव था।

सोलंकी वंश

सोलंकी वंश का संस्थापक मूलराज प्रथम था इसकी राजधानी अन्हिलवाड़ थी।

मूलराज प्रथम शैव धर्म का अनुयायी था।

भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गजनी ने सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया।

सोलंकी वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक जयसिंह सिद्धराज था।

प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचंद्र जयसिंह सिद्धराज के दरबार में था।

मोढेरा के सूर्य मंदिर का निर्माण सोलंकी राजाओं की शासनकाल में हुआ।

सिद्धपुर के रुद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण जय सीएम शिवराज ने किया था।

सोलंकी वंश का अंतिम शासक भीम द्वितीय था।

कलचुरीचेदि राजवंश

कलचुरी वंश का संस्थापक कोक्कल था।

इसकी राजधानी त्रिपुरी थी।

कलचुरी वंश का एक शक्तिशाली शासक गांगेयदेव था।

कलचुरी वंश चोरी सबसे महान शासक करण देव था जिस ने कलिंग पर विजय प्राप्त की।

प्रसिद्ध कवि राजशेखर कलचुरी के दरबार में ही रहते थे।

सिसोदिया वंश

सिसोदिया वंश के शासक अपने को सूर्यवंशी कहते थे।

सिसोदिया वंश के शासक मेवाड़ पर शासन करते थे मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ थी।

अपनी विजयों के उपलक्ष में विजय स्तंभ का निर्माण महाराणा कुंभा ने चित्तौड़ में करवाया।

खतौली का युद्ध 1518 ई. में राणा सांगा तथा इब्राहिम लोदी के बीच हुआ।

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